Monday, August 29, 2011

कंपन

"हाथ क्यों काँप रहा है तुम्हारा?"

लड़की की आवाज़ एक फुसफुसाहट थी, लेकिन उसमें एक विशेष मान था. वो प्रश्न उत्कंठा का सृजन नहीं था. 

यह क्षण महत्त्वपूर्ण था.

उत्तेजना में ही लज्जित, लड़के ने लड़की को आँखें फाड़ के देखा. कुछ ऊंची आवाज़ में उसने कहा,

"नीचे हाथ लगाने नहीं देती है, फिर पूछती है हाथ क्यों कांप रहा है!"

यह क्षण महत्त्वपूर्ण था.

लड़की को हंसी आ गई. उसके क्षण की जीत हो गयी थी. अलावा इसके स्पष्ट था कि लड़के के मन में जो जीव तेज़ गति से परिपक्व हो रहा था, लड़की के मन में अभी तक पैदा भी नहीं हुआ था. 


कुछ हफ़्तों बाद कश्मीर की एक वादी से लड़की को एक फोन आया. लाइन में बेतरह अस्पष्टता भरे इसी फोन का लड़की काफी दिनों से इंतज़ार कर रही थी. लेकिन यह बात जताई नहीं गई.  

लड़का दो मिनट के निर्धारित समय तक निरंतर बोलता रहा. आखिर में उसने छेड़ने के अंदाज़ में कहा, "माँ ने देख रखीं हैं मेरे लिए एक से एक! अगली बार आऊँगा तो अकेला नहीं जाऊंगा ! और अगर यहीं मुझ पर बम गिर जाए तो आऊंगा कैसे ?" और ज़ोरों से हंसने लगा.

"हूँ." लड़की ने उत्तर दिया.


कुछ और हफ़्तों बाद उसी शहर में फिर मिलने की योजना बनाई गयी. लड़का पहले आ पहुँचा था. एक रिक्शे से लड़की निकली. लड़के को देखते ही तेज़ - तेज़ क़दमों से उसकी ओर बढ़ गयी. लड़का मुस्कुराकर कुछ बोलने वाला ही था कि वह उससे लिपट गयी. आँखों से गर्म आंसुओं का उबाल उठा, जो बाद में लड़के की कमीज़ पर काफी दिनों तक सज्जित रहा

देर तक वे एक दूसरे से कुछ नहीं बोले.

फिर लड़के ने कहा,

"हाथ क्यों काँप रहा है तुम्हारा?"


In dedication to Chandradhar Sharma 'Guleri'

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